अकादमी का इतिहास

1981 में स्थापित केंद्रीय अकादमी राज्य वन सेवा या CASFOS के अधिदेश में विभिन्न राज्यों में भर्ती किए जाने वाले नए राज्य वन सेवा (एसएफएस) अधिकारियों को प्रशिक्षित करने और सेवारत राज्य वन सेवा अधिकारियों के लिए सेवाकालीन प्रशिक्षण का आयोजन शामिल है । अकादमी देहरादून स्थित विश्व प्रसिद्ध न्यू फॉरेस्ट कैम्पस के सुंदर और वनाच्छाीदित परिसर में अवस्थित है। उत्तराखंड राज्य की आकर्षक राजधानी, देहरादून, भारत में वानिकी शिक्षा और प्रशिक्षण का केंद्र रहा है।

शुरुआती दौर में, भारतीय वनों में नियुक्ति के लिए सिविल सेवा और सेना से कार्मिक प्राप्त किए गए थे। वर्ष 1864 में भारत आने वाले डॉ. डायट्रिच ब्रैंडिस, प्रथम वन महानिरीक्षक, भारत सरकार ने देश में वनों के प्रशासन और संरक्षण में उनकी सहायता हेतु पूर्णत: योग्य और वैज्ञानिक रूप से प्रशिक्षित अधिकारियों की आवश्यकता को पहचाना। ब्रैंडिस ने काफी पहले ही वैज्ञानिक रूप से प्रशिक्षित अधिकारियों की एक पूर्ण विकसित सेवा को अस्तित्वक में लाने की कल्पना कर ली थी और इसीलिए उन्होंने देश के वनों में नियुक्ति हेतु प्रशिक्षित वन अधिकारियों को तैयार करने के संबंध में प्रस्ताीव प्रस्तुत किए। उन्होंने निम्नतलिखित अनुशंसा की :

  • भारतीय वन विभागों के अप्रशिक्षित वन अधिकारियों हेतु यूरोप में वानिकी अध्ययन की सुविधाओं का प्रावधान,
  • यूरोप से परिवीक्षार्थियों का चयन कर महाद्वीप में उनके प्रशिक्षण के लिए व्यवस्था करना, तथा
  • यूरोप से प्रशिक्षित व्यंक्तियों को भारत भेजकर भारत के वन विभागों के प्रशासन में स्थायी सुधार के लिए एक योजना तैयार करना,
  • 1867 में, बम्ब ई के एक व्यापारी के पुत्र फ्रामजी रुस्तमजी देसाई सहित पांच प्रतिभागियों को फ्रांस में होने वाले प्रशिक्षण के लिए चुना गया। इसके साथ ही, कुछ अधिकारियों को प्रशिक्षित करने के लिए जर्मनी भेजा जाना भी आवश्यक समझा गया और वन निदेशक बर्कहार्डिट के अधीन प्रशिक्षण हेतु दो अन्यन प्रतिभागियों को हनोवर भी भेजा गया। ब्रैंडिस द्वारा प्रशिक्षण हेतु ढाई वर्ष की अवधि सुझाई गई थी। 1867 से 1886 के बीच कुल 95 अधिकारियों की भर्ती की गई और उन्हें यूरोप में जर्मनी, फ्रांस तथा ब्रिटेन के कूपर हिल्स, ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज और एडिनबर्ग में प्रशिक्षित किया गया।
  • 1911 में, निदेशक, भारतीय वन अध्ययन का पद सृजित किया गया और ए.एम. कैसिया की नियुक्ति इस पद पर की गई। उनका कार्य यूनाईटेड किंगडम में तीनों विश्वविद्यालयों में परिक्षार्थियों के अध्ययन का उच्च पर्यवेक्षण करना तथा महाद्वीप और इंग्लैंड में इन अधिकारियों के दौरों का व्यक्तिगत रूप से आयोजन करना था। 1914 में हुए युद्ध के कारण भर्ती बंद हो गई। युद्ध की शत्रुता समाप्त होने के उपरांत, युद्ध के दौरान सेना में सेवा देने वाले मेजर कैसिया को 5 साल की अवधि के लिए उनके पद पर पुन: नियुक्त किया गया जो 1925 में इस पद के समाप्त होने तक अपनी सेवाएं देते रहे।
  • हालाँकि 1913-14 में इस्लिंगटन आयोग की भारत यात्रा के दौरान भारत में आईएफएस परिक्षार्थियों को देहरादून में प्रशिक्षित किए जाने के प्रश्न पर विचार किया गया जहाँ 1906 में एक वन अनुसंधान संस्थान की स्थाापना हो चुकी थी; किंतु तकनीकी आधार पर इसे अस्वीकार कर दिया गया। इस प्रकार, भारतीय वन सेवा अधिकारियों का प्रशिक्षण ब्रिटिश विश्वविद्यालयों में जारी रहा।
  • युद्ध के तुरंत बाद, परिक्षार्थियों की मांग बढ़ गई और 1919 से 1923 के बीच, 152 परिक्षार्थियों को प्रशिक्षित किया गया। भारत सरकार चाहती थी कि सभी परिक्षार्थी एक ही केंद्र में प्रशिक्षित हों। अंतत:, इस्लिंगटन आयोग के समर्थन और ली आयोग (1923- 24), जिसने यह भी सिफारिश की थी कि भारतीय वन सेवा में 25% यूरोपी और 75% भारतीयों की भर्ती होने चाहिए, की सिफारिश के आधार पर गवर्नर-जनरल द्वारा भारतीय वन सेवा अधिकारियों का प्रशिक्षण 1 नवंबर, 1926 से वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून में शुरू किए जाने का निर्णय लिया गया।
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प्रशिक्षित अधिकारियों की बढ़ती मांग को अपेक्षाकृत कम लागत पर पूरा करने की दृष्टि से 1891 में पहली बार प्रांतीय सेवा के गठन के प्रस्ताव पर विचार आरंभ हुआ। इस सेवा के माध्यम से इंपीरियल सर्विस और अधीनस्थ कार्यकारी सेवा के बीच में एक कड़ी स्थापित की जानी थी। सेवा आरंभ होने के शुरुआती वर्षों में, इसमें आने वाले अधिकतर युवा यूरोपीय थे, किंतु शीघ्र इसे सीमित करने के निर्देश जारी कर दिए गए ताकि केवल मेधावी रेंजरों की पदोन्निति इस सेवा में की जा सके।

वर्ष 1906 में एफआरआई, देहरादून के अस्तित्व में आने के बाद, 1878 से रेंजरों को प्रशिक्षित करने वाले इंपीरियल फ़ॉरेस्ट स्कूल का दर्जा बढ़ाकर इम्पीरियल फ़ॉरेस्ट कॉलेज कर दिया गया और उसी वर्ष प्रांतीय सेवा में प्रवेश हेतु चयनित रेंजरों के प्रशिक्षण हेतु तीसरे वर्ष का एक पाठ्यक्रम भी शुरू किया गया।

वन विभाग के राज पत्रित अधिकारियों के प्रशिक्षण की मांग उठने तक 1933 से 1938 तक इन अधिकारियों का प्रशिक्षण निलंबित रहा। तब तक ‘वन’ विषय विभिन्न प्रांतों और रियासतों के नियंत्रण में अंतरित हो चुका था और भारतीय वन सेवा में भर्ती बंद हो गई थी। भारतीय वन सेवा के बदले राज्यों में सुपीरियर फ़ॉरेस्ट सर्विस आरंभ की गई और 1938 से इन अधिकारियों का प्रशिक्षण वन अनुसंधान संस्थानन, देहरादून में शुरू किया गया। पहले बैच में 16 छात्र शामिल थे। इस कॉलेज को इंडियन फॉरेस्ट् कॉलेज (भारतीय वन महाविद्यालय) नाम दिया गया और यह वन अनुसंधान संस्थान में मुख्य भवन के ही एक ब्लॉक में स्थित था।

कॉलेज में वर्ष 1975 तक सुपीरियर फ़ॉरेस्ट सर्विस पाठ्यक्रम जारी रहा। 01.10.1966 को भारतीय वन सेवा के गठन के परिणाम स्वरूप, उसके उपरांत भारतीय वन महाविद्यालय में चल रहे राज्य वन सेवा अधिकारियों के प्रशिक्षण पाठ्यक्रम को राज्य वन सेवा प्रशिक्षण पाठ्यक्रम का नाम दे दिया गया। आरंभ में,1971-73 से 1973-75 तक भारतीय वन सेवा परिक्षार्थियों का प्रशिक्षण राज्य वन सेवा के अधिकारियों के साथ संयुक्त रूप से आयोजित किया गया। हालांकि, भारतीय वन सेवा परिक्षार्थियों के पाठ्यक्रम में कुछ विषयों पर अतिरिक्त व्याख्यान भी शामिल किए गए थे। 1976-78 के बाद से, भारतीय वन सेवा परिक्षार्थियों और विदेशी प्रशिक्षुओं के लिए भारतीय वन महाविद्यालय, देहरादून में अलग पाठ्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। राज्य वन सेवा और भारतीय वन सेवा की कक्षाओं के विभाजन के साथ ही,राज्य वन सेवा अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिए मई 1976 में असम के बर्निहाट में एक अलग कॉलेज शुरू किया गया।

राज्य वन सेवा में प्रशिक्षित अधिकारियों की मांग में वृद्धि को पूरा करने के लिए, जनवरी 1980 में कोयंबटूर में एक दूसरे राज्य वन सेवा महाविद्यालय की स्थापना की गई । तदुपरांत, तीसरा राज्य वन सेवा महाविद्यालय मई 1981 में देहरादून में खोला गया था।

6 अगस्त, 2009 को देहरादून, कोयंबटूर और बर्निहाट में स्थित तीनों राज्य वन सेवा महाविद्यालयों का नाम बदलकर केंद्रीय अकादमी राज्य वन सेवा (CASFOS) कर दिया गया। वर्तमान में, राज्य वन सेवाओं के लिए भारत में तीन केंद्रीय अकादमी कार्यरत हैं। ये सभी भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत वन शिक्षा निदेशालय (डीएफई), देहरादून के सीधे नियंत्रण में कार्यरत हैं। बर्निहाट, असम में मई, 1976 में स्थापित अकादमी, भारत में स्थापित पहली अकादमी थी। देहरादून स्थित अकादमी भारत की तीसरी और अब तक स्थापित होने वाली अंतिम अकादमी है। इसकी स्थारपना 01.05.1981 को न्यूत फॉरेस्टा परिसर में की गई थी।